Class10th vidhutdhara ka chumbakiye prabhaw
विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव
(Magnetic Effect of Electric Current)
BSEB Class 10 Science - Complete Questions & Answers for Bihar Board Matric Exam 2025-26. यह (Class10th vidhutdhara ka chumbakiye prabhaw)अध्याय विद्युत धारा और चुंबकत्व के बीच संबंध को समझाता है, जिसमें विद्युत मोटर, जनित्र, विद्युत चुंबकीय प्रेरण और इनके व्यावहारिक उपयोग शामिल हैं।
📝 लघुउत्तरीय प्रश्न उत्तर (Short Answer Questions)
- सेल (Cell)
- बैटरी (Battery)
- D.C जनित्र या डायनेमो
- विद्युत धारा की दिशा
- चालक तार की स्थिति
- सुई और चालक के बीच की दूरी
- धारा की तीव्रता
चुम्बकीय पदार्थ: जो पदार्थ चुंबक से आकर्षित हों, वे चुंबकीय कहलाते हैं।
उदाहरण: लोहा, निकेल, कोबाल्ट, स्टील।
अचुम्बकीय पदार्थ: जो पदार्थ चुंबक से आकर्षित न हों, वे अचुंबकीय कहलाते हैं।
उदाहरण: लकड़ी, प्लास्टिक, कांच, रबर, तांबा।
- दक्षिण ध्रुव से अंदर जाता है और उतरी ध्रुव से बाहर निकलता है
- ध्रुव के करीब ये रेखाएं घनी होती है
- ये रेखाए एक दोसरे के समानांतर होती है
- ये रेखाएं एक दोसरे को नहीं काटती है
- परिनालिका के फेरों की संख्या पर
- विद्युत के मान पर
- क्रोड की प्रकृति पर
| स्थायी चुम्बक | विद्युत चुम्बक |
|---|---|
| स्थाई होता है | अस्थाई होता है |
| इसकी प्रबलता कम होती है | इसकी प्रबलता बढाई या घटाई जा सकती है |
| इस के ध्रुव निश्चित होते है | इस के ध्रुव धारा की दिशा बदलने पर बदल जाते है |
| इसे इस्पात से तैयार करते है | इसे नरम लोहा से तैयार करते हैं |
- विद्युत मोटर में: विद्युत उर्जा को यांत्रिक उर्जा में बदल के लिए
- विद्युत जनित्र में: यांत्रिक उर्जा को विद्युत उर्जा में बदलने में
- विद्युत घंटी में: घंटी के हथौड़े पर चुम्बकीय बल लगाने में
नोट: इस सिद्धांत की खोज प्रसिद्ध वैज्ञानिक माइकल फैराडे ने 1831 में की थी।
अतिभारण (Overloading): विद्युत से सम्बंधित एक ऐसी घटना जिसमें उपकरणों की कुल शक्ति अपनी परिपथ के स्वीकृत सीमा से अधिक बढ़ जाती है और उपकरण आवश्यकता से अधिक धारा का उपयोग करने लगते हैं अतिभारण कहलाता है। इस घटना में परिपथ का प्रतिरोध अधिक और धारा का मान निम्न हो जाता है।
लघुपतन (Short Circuit): ऐसी स्थिति जिसमें विद्युत मेन्स तार उदासीन तार के संपर्क में आ जाने से परिपथ का प्रतिरोध लगभग शून्य हो जाता है और धारा का मान अधिक तब इसे लघुपतन कहते हैं।
- सूखी बैटरी शुष्क सेल
- संचायक बैटरी
- सौर सेल
- डी.सी. जनित्र
- विद्युन्मय तार (Live wire): लाल रंग
- उदासीन तार (Neutral wire): काला रंग
- भू-तार (Earth wire): हरा रंग
📖 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर (Long Answer Questions)
- परिपथ में मानक क्षमता का फ्यूज या MCB अवश्य लगाएं।
- एक ही सॉकेट में बहुत अधिक उपकरण न जोड़ें।
- पुराने, कटे या ढीले तारों को तुरंत बदलें।
- तारों की उचित मोटाई और गुणवत्ता का प्रयोग करें।
- स्विच और प्लग को शुष्क रखें, नमी से बचाएं।
- उपकरणों के प्लग और तारों की समय-समय पर जांच करें।
- शॉर्ट सर्किट की स्थिति में तुरंत मेन स्विच बंद करें।
- अधिक भार वाले उपकरणों के लिए अलग सर्किट का उपयोग करें।
- (i) विद्युत मय तार (लाल): इनमें मेन्स यानि विद्युत मय तार का उपयोग 220V की प्रत्यायावर्ती धारा को लाने-लेजाने में किया जाता है।
- (ii) उदासीन (काला): यह विद्युत धारा को वापस विद्युत स्रोत तक पहुंचाने का कार्य करता है। यह परिपथ को पूर्ण करता है।
- (iii) भू तार (Earth Wire) - हरा रंग: यह तार सभी उपकरणों के धातु आवरण से जुड़ा होता है। इसका कार्य उपकरणों में किसी खराबी या करंट लीकेज की स्थिति में विद्युत धारा को पृथ्वी में प्रवाहित करना है ताकि व्यक्ति को झटका न लगे।
इसके अलावा परिपथ और बहुत सारे युक्ति जैसे स्विच, सॉकेट, MCB, फ्यूज आदि लगाये जाते है।
नोट: यहां ध्यान देने योग्य बात है कि हमें इस बात का ध्यान होना चाहिए कि पंखा, बल्ब जैसे उपकरण के वल 5A की धारा इस्तमाल करता है जबकि हीटर, गीजर, रेफ्रीजरेटर आदि 15A तो ऐसी स्थिति में उपस्कर जिसका विद्युत खपत जैसा उसका तार उसी अनुमतांक और फ्यूज भी 5A एवं 15A का ही इस्तमाल करना चाहिए ताकि लघुपतन और अतिभारण से बचा जा सके।
| दिविष्ट धारा (DC) | प्रत्यावर्ती धारा (AC) |
|---|---|
| जो धारा जो सदैव एक ही दिशा में प्रवाहित होती है, दिविष्ट धारा कहलाती है। | ऐसी धारा जो समान समय अंतराल के पश्चात अपनी दिशा परिवर्तित कर लेती है, वैकल्पिक धारा कहलाती है। |
| इस धारा का परिमाण एवं दिशा समय के साथ नियत रहता है। | इस धारा का परिमाण एवं दिशा समय के साथ बदलता रहता है। |
| इसमें विद्युत ऊर्जा का व्यय अधिक होता है। | इसमें विद्युत ऊर्जा का व्यय कम होता है। |
| इसके परिवर्तन से उपकरणों को नुकसान पहुंच सकता है। | इसके परिवर्तन से उपकरणों को नुकसान नहीं पहुंचता है। |
| इसमें विद्युत झटका नहीं दिया जा सकता है। | इससे विद्युत झटका दिया जा सकता है। |
| इसका घरेलू उपयोग नहीं किया जा सकता है। | इसका घरेलू एवं औद्योगिक उपयोग किया जा सकता है। |
प्रयोग द्वारा व्याख्या:
एक कुंडली को गैलवेनोमीटर से जोड़ देते है और उसके पास एक छड़ चुंबक लेकर उस के ध्रुव N को कुंडली की ओर लाया जाता है तो गैलवेनोमीटर में विचलन होता है, जो दर्शाता है कि कुंडली में धारा उत्पन्न हुई है। जब चुंबक को दूर ले जाया जाता है तो विचलन विपरीत दिशा में होता है। जब चुंबक स्थिर रहता है तो कोई विचलन नहीं होता।
फिर जब S ध्रुव को पुनः कुण्डली के आगे पीछे किया जाता है तो पुनः धारा का संकेत प्राप्त होता है लेकिन बार धारा की दिशा पहले की अपेक्षा उलटी होती है।
इससे स्पष्ट होता है कि चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन होने पर ही कुंडली में प्रेरित धारा उत्पन्न होती है।
फैराडे का नियम: प्रेरित विद्युत वाहक बल की मात्रा चुंबकीय फ्लक्स के परिवर्तन की दर के समानुपाती होती है, अर्थात: E ∝ dφ/dt
सिद्धांत: जब किसी चुंबकीय क्षेत्र में धारा वहन करने वाले चालक को रखा जाता है, तो उस पर एक चुंबकीय बल कार्य करता है, जिससे चालक घूमने लगता है। यह फ्लेमिंग के बाएं हाथ के नियम पर आधारित है।
कार्यविधि: इसमें एक कुंडली को स्थायी चुंबक के ध्रुवों के बीच रखते है, और बैटरी, ब्रश तथा विभक्त वलय से जोड़ देते है। और कुंजी चालू करते हैं तो कुंडली में विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है तो चुंबकीय क्षेत्र में रखे धारा-वाहक चालक पर चुंबकीय बल कार्य करता है, जिससे कुंडली घूमने लगती है।
कुंडली के दोनों पक्षों पर विपरीत दिशाओं में बल लगने से घूर्णन उत्पन्न होता है और आधा चक्कर पूरा होने पर विभक्त वलय धारा की दिशा बदल देता है, जिससे कुंडली एक ही दिशा में लगातार घूमती रहती है। इस प्रकार मोटर निरंतर कार्य करती रहती है और विद्युत ऊर्जा यांत्रिक ऊर्जा में बदल जाती है।
विभक्त वलय (कम्यूटेटर) का महत्व: विभक्त वलय (कम्यूटेटर) का विशेष महत्त्व यह है कि यह हर आधे चक्कर के बाद कुंडली में धारा की दिशा बदल देता है, जिससे कुंडली की घूर्णन दिशा स्थिर रहती है। यदि विभक्त वलय न हो तो कुंडली आधा चक्कर घूमकर रुक जाएगी और मोटर कार्य नहीं करेगी। इस प्रकार विभक्त वलय विद्युत मोटर के सुचारु एवं निरंतर संचालन के लिए अत्यंत आवश्यक है।
सिद्धांत: A.C. जनित्र की कार्यविधि विद्युत चुम्बकबीय प्रेरण पर आधारित है। जब किसी कुंडली से संबंधित चुम्बकीय बल रेखाओं की संख्या में परिवर्तन होता है जिसके परिणामस्वरूप कुंडली में प्रेरित धारा प्रवाहित होने लगती है। धारा की दिशा फ्लेमिंग के दक्षिण हस्त नियम के द्वारा ज्ञात की जा सकती है।
बनावट: एक सामान्य A.C. डायनेमो के निम्न भाग है:
- (i) स्थायी चुम्बक: इसमें एक शक्तिशाली चुम्बक होती है।
- (ii) कुंडली तथा कोड: बहुत सारे फेरे लगाकर कोड के ऊपर एक कुंडली बनायी जाती है, जो एक आर्मेचर पर लगी रही है। आर्मेचर चुंबक के ध्रुवों के मध्य घुर्णन करने के लिए स्वतंत्र होता हैं इसको लगातार घुमाने की व्यवस्था की जाती है।
- (iii) वलय: कुंडली के दोनों सिरे R1 व R2 दो वलयों से जुड़े रहते है।
- (iv) ब्रुश: वलय R1 व R2 से जुड़े B1 व B2 दो बुश होते हैं। ब्रुशों को संबंध परिपथ से कर दिया जाता है।
कार्यविधि: जब कुंडली घूमने लगती है तो इसकी भूजा AB ऊपर की ओर तथा CD नीचे की ओर जाते हुए चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं को काटती है। फलस्वरूप फ्लेमिंग के दक्षिण हस्त नियम के अनुसार इन भुजाओं में AB और CD के अनुदिश प्रेरित धाराएं प्रवाहित होने लगती है। इस प्रकार कुंडली में ABCD दिशा में प्रेरित विद्युत धारा प्रवाहित होती है।
यदि कुंडली में फेरों की संख्या अत्याधिक है तो प्रत्येक फेरे में उत्पन्न विद्युत धारा परस्पर संकलित होकर कुंडली में एक शक्तिशाली विद्युत धारा प्राप्त हो जाती है। अर्द्ध घूर्णन के पश्चात CD ऊपर की ओर तथा पूजा AB नीचे की ओर जाने लगती है। फलस्वरूप इन दोनों भूजाओं में प्रेरित विद्युत धारा की दिशा परिवर्तित हो जाती है और DCBA के अनुदिश नेट प्रेरित विद्युतधारा प्रवाहित होती है।
इस प्रकार अब वाह्य परिपथ में B1 से B2 दिशा में विद्युतधारा प्रवाहित होती है। अतः प्रत्येक आधे घूर्णन के पश्चात क्रमिक रूप से उन भुजाओं में विद्युत धारा की ध्रुवता परिवर्तित होती है।
ऐसी विद्युत धारा जो समान काल अंतरालों के पश्चात अपनी दिशा में परिवर्तन कर लेती है उसे प्रत्यावर्ती धारा (a.c.) कहते है।
विद्युत उत्पन्न करने की इस युक्ति को प्रत्यावर्ती विद्युत धारा जनित्र (a.c.जनित्र) कहते हैं।
