Class10th vidhutdhara ka chumbakiye prabhaw

Class10th vidhutdhara ka chumbakiye prabhaw

विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव
(Magnetic Effect of Electric Current)

BSEB Class 10 Science - Complete Questions & Answers for Bihar Board Matric Exam 2025-26. यह (Class10th vidhutdhara ka chumbakiye prabhaw)अध्याय विद्युत धारा और चुंबकत्व के बीच संबंध को समझाता है, जिसमें विद्युत मोटर, जनित्र, विद्युत चुंबकीय प्रेरण और इनके व्यावहारिक उपयोग शामिल हैं।

📝 लघुउत्तरीय प्रश्न उत्तर (Short Answer Questions)

Q1. चुंबक के निकट लाने पर दिक्सूचक की सुई विचलित क्यों हो जाती है?
उत्तर: दिक्सूचक की सुई स्वयं एक छोटे चुंबक की तरह होती है। जब इसके पास कोई अन्य चुंबक लाया जाता है तो बाहरी चुंबक का चुंबकीय क्षेत्र दिक्सूचक की सुई पर बल लगाता है, जिससे सुई अपनी सामान्य उत्तर-दक्षिण दिशा से हटकर विचलित हो जाती है।
Q2. परिनालिका किसे कहते हैं?
उत्तर: जब किसी विद्युतरोधी तार को सर्पिल (स्पाइरल) आकार में इस तरह लपेटा जाए कि तार के फेरे एक-दूसरे से अलग लेकिन अगल-बगल हो तो ऐसी व्यवस्था को परिनालिका कहा जाता है।
Q3. दिष्ट धारा के स्रोत को लिखें?
उत्तर: दिष्ट धारा के स्रोत निम्नलिखित हैं:
  • सेल (Cell)
  • बैटरी (Battery)
  • D.C जनित्र या डायनेमो
Q4. ओर्स्टेड के विद्युत-धारा के चुम्बकीय क्षेत्र सम्बन्धी नियम क्या है?
उत्तर: ओर्स्टेड के अनुसार - जब किसी चालक से विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तब उस चालक के चारों तरफ चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।
Q5. ओर्स्टेड के प्रयोग में चुंबकीय सुई के विचलन की दिशा किन-किन बातों पर निर्भर करती है?
उत्तर: ओर्स्टेड के प्रयोग में चुंबकीय सुई के विचलन की दिशा निम्न बातों पर निर्भर करती है:
  • विद्युत धारा की दिशा
  • चालक तार की स्थिति
  • सुई और चालक के बीच की दूरी
  • धारा की तीव्रता
Q6. चुम्बकीय और अचुम्बकीय पदार्थ क्या है?
उत्तर:

चुम्बकीय पदार्थ: जो पदार्थ चुंबक से आकर्षित हों, वे चुंबकीय कहलाते हैं।
उदाहरण: लोहा, निकेल, कोबाल्ट, स्टील।

अचुम्बकीय पदार्थ: जो पदार्थ चुंबक से आकर्षित न हों, वे अचुंबकीय कहलाते हैं।
उदाहरण: लकड़ी, प्लास्टिक, कांच, रबर, तांबा।

Q7. मैक्सवेल के दक्षिण हस्त (हाथ) का नियम लिखे
उत्तर: यदि धारावाही चालक तार को दाएं हाथ की मुट्ठी में इस प्रकार पकड़ा जाए कि अंगूठा धारा की दिशा की ओर संकेत करता हो, तो हाथ की एंठी अंगुलिय चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा को बताएंगे। मैक्सवेल का दक्षिण हस्त नियम चित्र
मैक्सवेल का दक्षिण हस्त नियम चित
Q8. क्रोड क्या है?
उत्तर: परिनालिका में प्रयोग किये जाने वाले नरम लोहे को क्रोड कहलाता है। इस प्रकार की व्यवस्था विद्युत चुम्बक में किया जाता है।
Q9. विद्युत मोटर में विभक्त वलय की भूमिका को समझाएं।
उत्तर: विद्युत मोटर में विभक्त वलय दिक् परिवर्तक का कार्य करता है। यह युक्ति परिपथ में विद्युत धारा के प्रवाह को उत्क्रमित करने में सहायता देती है इसे दिक् परिवर्तक कहते हैं।
Q10. चुबकीय क्षेत्र की रेखाओं के गुणों की सूची बनाएं।
उत्तर: चुम्बकीय क्षेत्र रेखा के गुण:
  • दक्षिण ध्रुव से अंदर जाता है और उतरी ध्रुव से बाहर निकलता है
  • ध्रुव के करीब ये रेखाएं घनी होती है
  • ये रेखाए एक दोसरे के समानांतर होती है
  • ये रेखाएं एक दोसरे को नहीं काटती है
Q11. विद्युत चुम्बक क्या है? इसे बनाने में किस पदार्थ का उपयोग होता है?
उत्तर: वैसा चुम्बक जिस में चुम्बकत्व का गुण उतने ही समय के लिए रहता है जितने समय तक धारा को प्रवाहित किया जाता है। इसे बनाने में नरम लोहे का प्रयोग किया जाता है।
Q12. विद्युत चुम्बक का चुम्बकत्व की तीव्रता (शक्ति) किन-किन बातों पर निर्भर करता है?
उत्तर: चुम्बक का गुण निम्न बातों पर निर्भर करता है:
  • परिनालिका के फेरों की संख्या पर
  • विद्युत के मान पर
  • क्रोड की प्रकृति पर
Q13. स्थाई चुम्बक क्या है इसे बनाने में किस पदार्थ का उपयोग किया जाता है?
उत्तर: स्थाई चुम्बक एक ऐसा चुम्बक है जिसमे चुम्बकत्व का गुण हमेशा बना रहता है जब तक कि उसे गर्म या उस पर किसी भी प्रकार का चोट न किया जाए। इस चुम्बक के निर्माण में इस्पात का इस्तमाल होता है।
Q14. स्थाई चुंबक और विद्युत चुंबक में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
स्थायी चुम्बक विद्युत चुम्बक
स्थाई होता है अस्थाई होता है
इसकी प्रबलता कम होती है इसकी प्रबलता बढाई या घटाई जा सकती है
इस के ध्रुव निश्चित होते है इस के ध्रुव धारा की दिशा बदलने पर बदल जाते है
इसे इस्पात से तैयार करते है इसे नरम लोहा से तैयार करते हैं
Q15. चुम्बकीय क्षेत्र रेखा एक दोसरे को काटती यानि प्रतिक्षेपित नहीं करती क्यों?
उत्तर: चुम्बकीय क्षेत्र रेखा एक दोसरे को काटती यानि प्रतिक्षेपित नहीं करती क्योंकि किसी भी कटान बिंदु पर दो स्पर्शरेखा खींचना संभव नहीं और एक ही स्थान पर चुबकीय क्षेत्र की दो दिशा नहीं मिलती अतः कहा जा सकता है कि चुम्बकीय क्षत्र रेखा एक दोसरे को नहीं काटती या काट सकती है। चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं एक दूसरे को नहीं काटती का प्रदर्शन
Q16. सीधा वाहक तार से गुजरने वाली धारा की दिशा बदलने पर चुंबकीय क्षेत्र की दिशा पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: धारा की दिशा बदलने पर चुंबकीय क्षेत्र की दिशा भी बदल जाती है।
Q17. विद्युत चुम्बक क्या है इस का उपयोग लिखें?
उत्तर: विद्युत चुम्बक का उपयोग:
  • विद्युत मोटर में: विद्युत उर्जा को यांत्रिक उर्जा में बदल के लिए
  • विद्युत जनित्र में: यांत्रिक उर्जा को विद्युत उर्जा में बदलने में
  • विद्युत घंटी में: घंटी के हथौड़े पर चुम्बकीय बल लगाने में
Q18. फ्लेमिंग के वाम-हस्त (बाएं हाथ) का नियम लिखे यह किस पर आधारित है?
उत्तर: अगर हम अपने बाएं हाथ की तीन अंगुली मध्यमा, तर्जनी तथा अंगूठे को परस्पर लम्बत फैलाए तो तर्जनी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा, मध्यमा धारा की दिशा तब अंगूठा धारावाही चालक तार पर लगने वाले बल की दिशा को दर्शाता है। यह नियम धारावाही चालक पर लगे चुंबकीय क्षेत्र के प्रभाव पर आधारित है। अंगूठा = बल, तर्जनी = क्षेत्र, मध्यमा = धारा।
Q19. विद्युत मोटर का क्या सिद्धांत है?
उत्तर: विद्युत मोटर का सिद्धांत यह है कि जब किसी चुंबकीय क्षेत्र में धारा वहन करने वाले चालक को रखा जाता है, तो उस पर एक चुंबकीय बल कार्य करता है, जिससे चालक घूमने लगता है। इसी सिद्धांत पर मोटर कार्य करती है।
Q20. विद्युत चुंबकीय प्रेरण क्या है?
उत्तर: विद्युत चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) इलेक्ट्रोमैग्नेटिज़्म का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है जिसमें जब किसी बंद लूप में चुंबक जितने समय तक आपेक्षिक गति दी जाती है लूप में उतने समय के लिए विद्युत धारा पैदा होती रहती है।

नोट: इस सिद्धांत की खोज प्रसिद्ध वैज्ञानिक माइकल फैराडे ने 1831 में की थी।

Fardays_Law_Drawing
Q21. प्रेरित धारा की दिशा में फ्लेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम लिखे?
उत्तर: अगर अपने दाहिने हाथ के अंगूठा, तर्जनी और मध्यमा परस्पर (आपस) में समकोणिक (90°) इस तरह रखें गए हो, कि तर्जनी, चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को बताए तो अंगूठा गति की दिशा में हो, तो मध्यमा प्रेरित धारा की दिशा को बताएगा। अंगूठा = गति, तर्जनी = चुंबकीय क्षेत्र, मध्यमा = उत्पन्न धारा
Q22. विद्युत जनित्र क्या है?
उत्तर: वह यंत्र जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है, उसे विद्युत जनित्र (Generator) कहा जाता है।
Q23. विद्युत जनित्र का सिद्धांत लिखिए।
उत्तर: विद्युत जनित्र विद्युत-चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है। जब किसी कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है, तो उसमें प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न होती है। यही सिद्धांत जनित्र का आधार है।
Q24. अतिभारण एवं लघुपतन को परिभाषित करे?
उत्तर:

अतिभारण (Overloading): विद्युत से सम्बंधित एक ऐसी घटना जिसमें उपकरणों की कुल शक्ति अपनी परिपथ के स्वीकृत सीमा से अधिक बढ़ जाती है और उपकरण आवश्यकता से अधिक धारा का उपयोग करने लगते हैं अतिभारण कहलाता है। इस घटना में परिपथ का प्रतिरोध अधिक और धारा का मान निम्न हो जाता है।

लघुपतन (Short Circuit): ऐसी स्थिति जिसमें विद्युत मेन्स तार उदासीन तार के संपर्क में आ जाने से परिपथ का प्रतिरोध लगभग शून्य हो जाता है और धारा का मान अधिक तब इसे लघुपतन कहते हैं।

Q25. फ्यूज क्या है इसे परिपथ में किस क्रम में जोड़ते है।
उत्तर: फ्यूज एक सुरक्षा की युक्ति है जो तांबे और टिन के मिश्रधातु का बना होता है और जिसकी प्रतिरोधकता अधिक और गलनांक बहुत ही कम होता है। इसे परिपथ में श्रेणीक्रम में जोड़ते हैं।
Q26. दिष्ट धारा के कुछ स्रोतों के नाम लिखिए।
उत्तर: दिष्ट धारा (DC) के प्रमुख स्रोत हैं:
  • सूखी बैटरी शुष्क सेल
  • संचायक बैटरी
  • सौर सेल
  • डी.सी. जनित्र
Q27. फ्यूज का अनुमतांक क्या है घरेलु उपयोग में इस का अनुमतांक कितना हो है?
उत्तर: विद्युत धारा की प्रबलता के जिस मान पर पहुंचते ही फ्यूज गल जाता है उसे फ्यूज या तार का अनुमतांक (या क्षमता) कहते हैं। जैसे घरेलु उपयोग के लिए 5A और 15A का होता है।
Q28. विद्युन्मय, उदासीन तथा भू-तारों के विद्युतरोधी आवरण सामान्यतः किस-किस रंग के होते हैं?
उत्तर: घरेलू विद्युत संयोजन में तारों के रंग सामान्यतः इस प्रकार होते हैं:
  • विद्युन्मय तार (Live wire): लाल रंग
  • उदासीन तार (Neutral wire): काला रंग
  • भू-तार (Earth wire): हरा रंग

📖 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर (Long Answer Questions)

Q29. विद्युत परिपथ में अतिभारण और लघुपतन से बचने के उपाय को बताएं।
उत्तर: अतिभारण (Overloading) और लघुपथन (Short Circuit) विद्युत दुर्घटनाओं के मुख्य कारण हैं। इनसे बचाव के लिए निम्न उपाय अपनाने चाहिए:
  • परिपथ में मानक क्षमता का फ्यूज या MCB अवश्य लगाएं।
  • एक ही सॉकेट में बहुत अधिक उपकरण न जोड़ें।
  • पुराने, कटे या ढीले तारों को तुरंत बदलें।
  • तारों की उचित मोटाई और गुणवत्ता का प्रयोग करें।
  • स्विच और प्लग को शुष्क रखें, नमी से बचाएं।
  • उपकरणों के प्लग और तारों की समय-समय पर जांच करें।
  • शॉर्ट सर्किट की स्थिति में तुरंत मेन स्विच बंद करें।
  • अधिक भार वाले उपकरणों के लिए अलग सर्किट का उपयोग करें।
Q30. घरेलू विद्युत परिपथों में से एक परिपथ का व्यवस्था आरेख खींचें। और समझाए
उत्तर: हम जानते हैं कि घरेलु परिपथ में प्रत्यायावर्ती धारा वहती है इसके लिए हम घर की वैरिंग में तीन तरह के तार का उपयोग करते हैं:
  • (i) विद्युत मय तार (लाल): इनमें मेन्स यानि विद्युत मय तार का उपयोग 220V की प्रत्यायावर्ती धारा को लाने-लेजाने में किया जाता है।
  • (ii) उदासीन (काला): यह विद्युत धारा को वापस विद्युत स्रोत तक पहुंचाने का कार्य करता है। यह परिपथ को पूर्ण करता है।
  • (iii) भू तार (Earth Wire) - हरा रंग: यह तार सभी उपकरणों के धातु आवरण से जुड़ा होता है। इसका कार्य उपकरणों में किसी खराबी या करंट लीकेज की स्थिति में विद्युत धारा को पृथ्वी में प्रवाहित करना है ताकि व्यक्ति को झटका न लगे।

इसके अलावा परिपथ और बहुत सारे युक्ति जैसे स्विच, सॉकेट, MCB, फ्यूज आदि लगाये जाते है।

नोट: यहां ध्यान देने योग्य बात है कि हमें इस बात का ध्यान होना चाहिए कि पंखा, बल्ब जैसे उपकरण के वल 5A की धारा इस्तमाल करता है जबकि हीटर, गीजर, रेफ्रीजरेटर आदि 15A तो ऐसी स्थिति में उपस्कर जिसका विद्युत खपत जैसा उसका तार उसी अनुमतांक और फ्यूज भी 5A एवं 15A का ही इस्तमाल करना चाहिए ताकि लघुपतन और अतिभारण से बचा जा सके।

घरेलु विधुत परिपथ
Q31. दिष्ट धारा प्रत्यावर्ती धारा में अंतर लिखे।
उत्तर:
दिविष्ट धारा (DC) प्रत्यावर्ती धारा (AC)
जो धारा जो सदैव एक ही दिशा में प्रवाहित होती है, दिविष्ट धारा कहलाती है। ऐसी धारा जो समान समय अंतराल के पश्चात अपनी दिशा परिवर्तित कर लेती है, वैकल्पिक धारा कहलाती है।
इस धारा का परिमाण एवं दिशा समय के साथ नियत रहता है। इस धारा का परिमाण एवं दिशा समय के साथ बदलता रहता है।
इसमें विद्युत ऊर्जा का व्यय अधिक होता है। इसमें विद्युत ऊर्जा का व्यय कम होता है।
इसके परिवर्तन से उपकरणों को नुकसान पहुंच सकता है। इसके परिवर्तन से उपकरणों को नुकसान नहीं पहुंचता है।
इसमें विद्युत झटका नहीं दिया जा सकता है। इससे विद्युत झटका दिया जा सकता है।
इसका घरेलू उपयोग नहीं किया जा सकता है। इसका घरेलू एवं औद्योगिक उपयोग किया जा सकता है।
दिष्ट धारा और प्रत्यावर्त धारा का आरेख जिसमें DC को सीधी रेखा और AC को साइन वेव के रूप में दिखाया गया है।
Q32. विद्युत चुंबकीय प्रेरण की परिघटना को समझावें। सचित्र?
उत्तर: जब किसी चालक कुंडली के साथ जुड़े चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन किया जाता है तो उस कुंडली में विद्युत वाहक बल (EMF) उत्पन्न हो जाता है और उसमें प्रेरित विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है। इस घटना को विद्युत चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) कहते हैं।

प्रयोग द्वारा व्याख्या:

एक कुंडली को गैलवेनोमीटर से जोड़ देते है और उसके पास एक छड़ चुंबक लेकर उस के ध्रुव N को कुंडली की ओर लाया जाता है तो गैलवेनोमीटर में विचलन होता है, जो दर्शाता है कि कुंडली में धारा उत्पन्न हुई है। जब चुंबक को दूर ले जाया जाता है तो विचलन विपरीत दिशा में होता है। जब चुंबक स्थिर रहता है तो कोई विचलन नहीं होता।

फिर जब S ध्रुव को पुनः कुण्डली के आगे पीछे किया जाता है तो पुनः धारा का संकेत प्राप्त होता है लेकिन बार धारा की दिशा पहले की अपेक्षा उलटी होती है।

इससे स्पष्ट होता है कि चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन होने पर ही कुंडली में प्रेरित धारा उत्पन्न होती है।

फैराडे का नियम: प्रेरित विद्युत वाहक बल की मात्रा चुंबकीय फ्लक्स के परिवर्तन की दर के समानुपाती होती है, अर्थात: E ∝ dφ/dt

प्रेरित विद्युत वाहक बल (E) चुंबकीय फ्लक्स में होने वाले परिवर्तन की दर के समानुपाती होता है।
Q33. विद्युत मोटर का नामांकित आरेख खींचिए। इसका सिद्धांत तथा कार्यविधि स्पष्ट कीजिए। विद्युत मोटर में विभक्त वलय का क्या महत्त्व है?
उत्तर: विद्युत मोटर वह यंत्र है जो विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित करता है।

सिद्धांत: जब किसी चुंबकीय क्षेत्र में धारा वहन करने वाले चालक को रखा जाता है, तो उस पर एक चुंबकीय बल कार्य करता है, जिससे चालक घूमने लगता है। यह फ्लेमिंग के बाएं हाथ के नियम पर आधारित है।

कार्यविधि: इसमें एक कुंडली को स्थायी चुंबक के ध्रुवों के बीच रखते है, और बैटरी, ब्रश तथा विभक्त वलय से जोड़ देते है। और कुंजी चालू करते हैं तो कुंडली में विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है तो चुंबकीय क्षेत्र में रखे धारा-वाहक चालक पर चुंबकीय बल कार्य करता है, जिससे कुंडली घूमने लगती है।

कुंडली के दोनों पक्षों पर विपरीत दिशाओं में बल लगने से घूर्णन उत्पन्न होता है और आधा चक्कर पूरा होने पर विभक्त वलय धारा की दिशा बदल देता है, जिससे कुंडली एक ही दिशा में लगातार घूमती रहती है। इस प्रकार मोटर निरंतर कार्य करती रहती है और विद्युत ऊर्जा यांत्रिक ऊर्जा में बदल जाती है।

विभक्त वलय (कम्यूटेटर) का महत्व: विभक्त वलय (कम्यूटेटर) का विशेष महत्त्व यह है कि यह हर आधे चक्कर के बाद कुंडली में धारा की दिशा बदल देता है, जिससे कुंडली की घूर्णन दिशा स्थिर रहती है। यदि विभक्त वलय न हो तो कुंडली आधा चक्कर घूमकर रुक जाएगी और मोटर कार्य नहीं करेगी। इस प्रकार विभक्त वलय विद्युत मोटर के सुचारु एवं निरंतर संचालन के लिए अत्यंत आवश्यक है।

विद्युत धारा प्रवाहित होने पर कुंडली पर बल लगता है, जिससे वह चुंबकीय क्षेत्र में घूमने लगती है।
Q34. डायनेमो या जनित्र क्या है? इसके क्रिया सिद्धांत और कार्यविधि का सचित्र वर्णन करें।
उत्तर:

सिद्धांत: A.C. जनित्र की कार्यविधि विद्युत चुम्बकबीय प्रेरण पर आधारित है। जब किसी कुंडली से संबंधित चुम्बकीय बल रेखाओं की संख्या में परिवर्तन होता है जिसके परिणामस्वरूप कुंडली में प्रेरित धारा प्रवाहित होने लगती है। धारा की दिशा फ्लेमिंग के दक्षिण हस्त नियम के द्वारा ज्ञात की जा सकती है।

बनावट: एक सामान्य A.C. डायनेमो के निम्न भाग है:

  • (i) स्थायी चुम्बक: इसमें एक शक्तिशाली चुम्बक होती है।
  • (ii) कुंडली तथा कोड: बहुत सारे फेरे लगाकर कोड के ऊपर एक कुंडली बनायी जाती है, जो एक आर्मेचर पर लगी रही है। आर्मेचर चुंबक के ध्रुवों के मध्य घुर्णन करने के लिए स्वतंत्र होता हैं इसको लगातार घुमाने की व्यवस्था की जाती है।
  • (iii) वलय: कुंडली के दोनों सिरे R1 व R2 दो वलयों से जुड़े रहते है।
  • (iv) ब्रुश: वलय R1 व R2 से जुड़े B1 व B2 दो बुश होते हैं। ब्रुशों को संबंध परिपथ से कर दिया जाता है।

कार्यविधि: जब कुंडली घूमने लगती है तो इसकी भूजा AB ऊपर की ओर तथा CD नीचे की ओर जाते हुए चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं को काटती है। फलस्वरूप फ्लेमिंग के दक्षिण हस्त नियम के अनुसार इन भुजाओं में AB और CD के अनुदिश प्रेरित धाराएं प्रवाहित होने लगती है। इस प्रकार कुंडली में ABCD दिशा में प्रेरित विद्युत धारा प्रवाहित होती है।

यदि कुंडली में फेरों की संख्या अत्याधिक है तो प्रत्येक फेरे में उत्पन्न विद्युत धारा परस्पर संकलित होकर कुंडली में एक शक्तिशाली विद्युत धारा प्राप्त हो जाती है। अर्द्ध घूर्णन के पश्चात CD ऊपर की ओर तथा पूजा AB नीचे की ओर जाने लगती है। फलस्वरूप इन दोनों भूजाओं में प्रेरित विद्युत धारा की दिशा परिवर्तित हो जाती है और DCBA के अनुदिश नेट प्रेरित विद्युतधारा प्रवाहित होती है।

इस प्रकार अब वाह्य परिपथ में B1 से B2 दिशा में विद्युतधारा प्रवाहित होती है। अतः प्रत्येक आधे घूर्णन के पश्चात क्रमिक रूप से उन भुजाओं में विद्युत धारा की ध्रुवता परिवर्तित होती है।

ऐसी विद्युत धारा जो समान काल अंतरालों के पश्चात अपनी दिशा में परिवर्तन कर लेती है उसे प्रत्यावर्ती धारा (a.c.) कहते है।

विद्युत उत्पन्न करने की इस युक्ति को प्रत्यावर्ती विद्युत धारा जनित्र (a.c.जनित्र) कहते हैं।

घूमती हुई कुंडली चुंबकीय क्षेत्र में प्रेरित धारा उत्पन्न करती है, जो स्लिप रिंग्स द्वारा बाहरी परिपथ को दी जाती है।
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